अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 10

विकृत परिस्थिति से प्राणी हीं रोगी नहीं डी जाते, वल्कि ओषधियाँ मी रोगी हीं जाती हैं । अतएव आप्रेय का प्रधान आग्रह यह है कि दूषित परिस्थिति उत्पन होने से पूर्व ही औषधियों का संग्रह करके रखा जाए ताकि ये दूषित तत्वों से अमिव्याप्त न हाँ । विशेषता क्यों औषधियों का प्रयोग सामूहिक रोगों में किया जाना चाहिए । हसदो साध ही सालिक आचारक्वेव्यवठार का पालन भी किया जाए ताकि हमारी मानसिक शुद्धि हो । आत्रेय का अधिक आग्रह औषधियों के विशुद्ध प्रयोग पर ही हे । पस्तु इस काल में औषधि प्रयोग पर आग्रह न होकर मंत्रन्तंत्रों और जादू-टोटकों पर अधिक जोर दिया गया है । आत्रेय के युग में मानसिक शुद्धि के लिए क्रिन्ही भी महर्षियों और ब्रह्मचारिर्यो का सत्संग पर्याप्त था । परंतु इस काल में ऐसे अवसरों कै लिए तीन प्रकार के लोगों की श्रेणियाँ वन गई र्थी । उनके नाम यों है

1. औपनिषदिक वर्ग । ”

2. चिकित्सक वर्म ।

3. सिद्ध तापस वर्ग ।

औपनिषदिक वर्ग जाप, पुरश्चरण तथा व्रतादि करते थे । चिकित्सक दवाइयाँ खिलाते ये, सिद्धन्तापस वर्ग जादू-टोना का प्रयोग किया करते थे । इस प्रकार सामूहिक रोगों कै प्रतिकार के लिए तीनों ही वर्ग अपना व्यवसाय चलाने लगे थे, कौटिल्य के लेख से यह स्पष्ट होता हे 3 इतना ही नहीँ कुछ और भी तांत्रिक उपायों का कौटिल्य ने विशेष उल्लेख किया हे…

1. तीर्थों में स्नान किया जाए।

2. महाकच्छवर्घन किया जाए (संभवतद लंबीन्त’बी जटाएँ और दाढीखूँछ बढाने का अभिप्राय है) 1

3. श्मशान में गौबों का दोहन किया जाए ।

4. धड़ को जलाया जाए पुतला बनाकर ।

5. रात्रि मर जागकर देवताओं की उपासना की जाए । इन उपायों की कोई वैज्ञानिक व्याख्या कर सकना दुदृसाहस ही है । रूढि और अंधक्वेविश्यासों के सिवा इनका कोई अर्य और मी है, यह तो वे सिद्ध और तापस ठी जाने । खैर, जो हो, हम यह तो कह ही सकते हैं कि इस युग के प्रारंभ तक विशुद्ध यैज्ञानिक विचारों में रूढि और अंधविश्वासोंक पर्याप्त स्यान पित गया था । लोग मंत्रन्तंत्रों पर यहाँ तक बिश्यास करने लगे वै कि वह भी एक स्वतंत्र कला का रूप धारण करने लगा था । हमने पीछे लिखा है कि पंत्रचंत्रों की शिक्षा देने के लिए तक्षशिला वो विश्वविद्यालय तक में एक स्वतंत्र दिमाग या । मंत्रचंत्र से अभिलषित अर्थ की सिद्धि हो सकती है, यह उस युग के जनसाधारण का विस्वास धन चुका था । कौटिल्य ने अनेक प्रकार के मंत्र तथा तंत्र युक्तियों का विस्तार से उल्लेख किया है ।

हम मध्यकाल में लिख चुके हैँ कि उस काल को हम “लोह चिकित्सा‘ का आविष्कारक कह सकते हैँ । उत्तर काल को वही चिकित्सा बिधि मध्य काल ने बिशेष रुप से अपने उत्तराधिकार सें दी थी । इर्सी कारण आदिकालीन आविष्कारों पर कोई नवीन और महत्त्वपूर्ण अनुसंधान न होकर लौह चिकित्सा पर ही नए-नए अनुसंधान इस युग में भी जारी रहे । लोहा, सोना, चाँदी, मुक्ता, मणियों तथा अनेक प्रकार के विषोपविषों पर भी इस युग में बड़े-बड़े अनुसंधान हुए । दवाइयों की मात्रा अल्प से अल्प हो इसी बात मेंवेद्य की चतुरता का अनुमान लगाया जाने लगा । कुमार भवृं जीवक के वर्णन को पढने पर हम इस बात को प्रत्यक्ष देखेंगे ।३फलत: इस काल वो बिशेष अनुसंधान की सामग्री, खनिज, प्राणिज़ और चिषों कं संबंध में कुछ अधिक विचार कर लेना विशेष संगत ही होगा ।

इस युग के विशेष चिकित्सा द्रव्य

यधपि पिछले संदर्भ में चिप्रकीर्ण (बिखरा हुआ) रूप से हमने चिकित्सा द्रव्यों कै संबंध मेँ भी विचार किया हे । परंतु चिकित्सा के प्रधान उपादानों को विप्रकीर्ण सा से पढ लेना मात्र पर्याप्त नहीं कहा जा सकता । हमेँ उनके संबंध में कुछ गहराई से सोचना चाहिए । आदिकाल में औषधि द्रव्य तीन प्रकार के ये । उनका क्रम यों था…

1. स्थावर द्रव्य-जडी-बूटीं आदि

2, जंगम द्रव्य-चर्म, रुधिर आदि

3. पार्थिव द्रव्य-सोनर, चाँदी आदि

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