अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 2

विनय पिटक में भगवान् बुद्ध ने विस्तारपूर्वक औषधियों के निमणि, सेवन ज्या वितरण की व्यवस्था की है । उसमें न केवल जड्री-बूटियों ही, बल्कि घृत, मधु. क्यों, कषाय, फलन्मत्र, गोंद, लवण, चूर्ण, मांसडरक्त, धूम्रपान, नस्य और मध आदि समी फ्तार्यों की ओषच्युपयोगी व्यवस्था है । स्वेद, ‘वीर-फाड, बिष चिकित्सा, भूतदिधा आदि कितने ठी महत्त्वपूर्ण आयुर्वेदरिगें का अनुशासन विधमान है । वह कहना कि भगवान् बुद्ध कै प्रचार ने आयुर्वेद की क्षति पहुँचाई, किसी भाँति उचित क्या है ।

आयुर्वेदिक बिज्ञान को उपयोगिता अनुभव करने कै कारण ही भाणा कुछ ने अपने समकालीन प्राणत्सार्य कुमारभवृं जीवक क्रो एक वेच होने कै नाते ही क्या हुँक्ति प्रदान फी घी । उस समय भी आयुर्वेद एक चमत्कारी विज्ञान कै रूप में जीक्लि था ; जीवक के अध्याय पढने पर आप देखेंगे कि एक बार भगवान् बुद्ध कॅ रोगी शरीर क्रो शुद्ध करने के निमित्त जीवक ने रेचन तैयार किया । वह रेचनोषथि तीन चम्मचों ने अलग-अलग प्रस्तुत की गई यी । प्रत्येक चम्मच की औषधि को कंवल मूँघने मात्र से ही दस दस्त होने का जीवक ने दावा किया और लूँधने पर दस ही दस्त हुए । दूसरी बार नी दस और तीसरी चार भी दस । यह तत्कालीन आयुर्वेद हुक्के समुन्नत और चमत्कारी स्वरूप का चित्र ही हे । जीवक की यिद्भत्तापूर्ण एक नहीं अनेक घटनाएँ ऐसी हैं जिन्हें आप उस अध्याय में पढेगे । न कंवल शरीर चिकित्सा बल्कि शल्य-चिकित्सा भी उस युग में अत्यंत समुन्नत दशा मेँ थी । जीवक की कपाल-भेदन प्रक्रिया का उल्लेख हमें यह बतलाता है कि उस समय तक भी शल्य शास्त्र का ऊँचा ज्ञान जो भारतीयों क्रो था, वह संसार की किसी दूसरी जाति को न था । प्रत्युत अन्थ देशवासी भारत से ही यह विज्ञान सीखा करते वे ईसा से चार सौं वर्ष पूर्व पर्शियन (ईरान) सम्राट के राजवैद्य क्टेसियस ने भारतवर्ष के संबंध में एक पुस्तक लिखी थी । इस पुस्तक के जो भाग अब तक उपलब्ध होते हैं, उनसे भारतीय चिकित्सा पद्धति पर बहुत प्रकाश पड़ता है । क्टेसिंयस के वर्णन से इस परिणाम पर सरलता से पहुंचा जा सकता है कि उस समय तक भी ईरान, यूनान और मिस्र आदि पाश्चात्य देश चिकित्सा शास्त्र भारतीयों से ही तीखा करते ये 3 कालिदास दो वर्णन से हम जानते हैं कि इतिहास कै आदिकाल में ही सम्राट रघु ने, पश्चिमोत्तर प्रांत से आगे भूमध्य सागर तक के प्राया समस्त अफगानी, ईरानी और टर्किश, प्रदेकांन्सेच्छ देश) को दिग्विजय करर्के अपने कोसल राज्य में मिला तिया घा देश हजारों वर्षों तक भारतीय सप्रार्टों की छत्रछाया में रह चुके है । उन्होंने सभ्यता से क्या नहीं सीखा? आदिकाल में जिस प्रकार शिक्षा का सर्वोच्च काशी था उसी प्रकार इस समय यह कार्य तक्षशिला कर रही यी । तक्षशिला से उतरकर काशी, उज्जयिनी ओर विदर्भ आदि देशो कं विश्वविद्यालय भी शिक्षा प्रसार का गौरवपूर्ण कार्य कर रहे ये । उन सब में आयुर्वेद भी एक महत्वपूर्ण शिक्षा का विषय था । जातक ग्रंथों से विदित होताड्डे कि तक्षशिला में वेद तया अठारह विद्याएँ पढाई आती थीं जिसमेँ शिल्प, धनुर्विद्या आदि के अतिरिक्त आयुर्वेद एक प्रधान विषय था । पितु आत्रेय इस विषय के आचार्य थे । कुमार भर्चुजीवक ने यहीँ शिक्षा प्राप्त की धी । क्रोसल कै प्रसिद्ध राजा पसेनदी (प्रसेनजित्) यहीं पढे ये । काशी के राजकुमार ब्रह्मदत्त इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी ये । किम्बहुना, प्रख्यातनामा आचार्य चाणक्य तथा उनके सहपाठी विष्णुशर्मा को शिक्षित बनाने का श्रेय इसी विश्वविद्यालय को था । बड़े-बड़े राजकुमार तक्षशिला में विद्याध्ययन के लिए जाया करते थे । इस युग कै प्रारंभ काल में अन्य विद्यार्थियों कें अतिरिक्त प्राय: 101 राजकुमार इस विद्यालय में विद्याध्ययन कर रहे थे । इतना ही नहीं तीनों वेद और अठारह विद्याओं के अध्यापन कँ लिए विश्वविख्यात क्तिने ही आचार्य वहाँ मौजूद थे । प्रत्येक आचार्य के पास 500 विद्यार्थी पढा करते ये । यदि हम उक्त 21 विषयों के इवकीस ही आचार्य मान लें तो भी तक्षशिला के विश्वविद्यालय में पढ़नेचाले विद्याप्टिश्यों की संख्या प्राय: 10601 निकलती हे । चाणक्य ने अपने कौटिल्य अर्थशास्त्र में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख किया जिससे प्रतीत होता है कि उस युग में ऋत्विक, पुरोहित, आचार्य और वेद पढ़नेचालों को राज्य की ओर से वेतन और मुफ्त भूमि दी जाती थी । जिसकी आय से निश्चित होकर वे जीवन निर्वाह करते हुए विद्या का विस्तार कर सकें ।3 ऐसे विद्धानों के सत्कार के निमित्त जो संपति राष्ट्र देता था वह “पूजा वेतन’ कहा जाता था । निर्धन विद्यार्थी भी सरलता से शिक्षा पा सकते थे । परंतु उन्हें दिन में कुछ समय विद्यालय का काम करना पढ़ता पा और उस कार्य के बदले में मिला हुआ पुरस्कार उनकी शिक्षा में व्यय किया जाता था । ‘

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