अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 3

दूत वाक्या में एक घटना यों भी लिखी हे-“एक ब्राह्मण कुमार बहुत गरीब घर में क्या था । उसे शिक्षा की बहुत लगन थी । वह तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढने का रुठुत इच्छुक था । पर “आचार्य भाग’ या विश्वविद्यालय की नियत फीस कहौं से तातार अत: उसने प्रतिज्ञा को कि शिक्षा समाप्त होने पर मैं सारी फीस दे दूँगा । यह बात् मान ली गई । वह ‘आचार्य भाग दायक‘ अन्य विद्यार्थियों की भाँति आराम से पढता रहा और शिक्षा समाप्त कर चुकने पर उसने अपनी योग्यता और प्रयत्न से आवश्यक ‘आचार्य भाग‘ अदा कर दिया 11 तत्कालीन शिक्षा प्रणाली को हम इतने से ही ‘मती-भाँति हृदयंणापृ कर सकते हैं ।

तक्षशिला की यह पद्धति उत्तरकाल और मध्यकाल की शिक्षा व्यवस्थाओं पर एक-सा प्रकाश डालती हे क्योंकि उत्तरकाल कै प्रारंभ में ही तक्षशिला का विश्वविद्यालय स्थापित नहीँ हुआ था । वह वहुत पूर्व से ही स्थापित था । वस्तुतष्ट वह मध्य काल की देन कहा जा सकता है । विद्वानों की राय है कि विश्वविख्यात व्याकरणाचार्य पाणिनी, जो ईसा से कम से कम 700 वर्ष पूर्व हुए ये, तक्षशिला कै जगदृविख्यात विश्वविद्यालय फे ही पढे हुए आचार्य थे । फलतदृ इंसा से 600 वर्ष पूर्व एवं हमारे इस उत्तरकाल के प्रारंभ तक तक्षशिला न जाने कितने प्रकांड विद्वान उत्पन्न कर चुकीं थी । विद्धान लेखक राइस-डेविड महोदय ने भारती मासिक पत्रिका में लिखा था कि न केवल भारत के ही बल्कि बेबीलोनियन, मिश्र, फिनीशियन, सोरियन, अरब तथा चीन आदि देशों फे भी विधार्थी एवं स्वाथ्यायशील विद्वान, आयुर्वेद अध्ययन के लिए तक्षशिला कं विश्वविधालय में आया करते ये ऐसी दशा में वे लोग कितने भ्रम में हैं जो यह समझते हैं कि भारतीय आयुर्वेद पर ग्रीक (यूनान) विद्वानों का कोई ऋण है । ग्रीस में चिक्खि। पद्धति का प्रथम संस्थापक हिपोफेटिस था, जो ईसा से केवल 460 वर्ष पूर्व कास नगर मेँ उत्पन्न हुआ था । इतिहास इस बात का साक्षी है कि ग्रीक लोग ही भारतीयों से आयुर्वेद विज्ञान प्राप्त काते रहे हैं । यही कारण है कि ग्रीक वैद्यक (यूनानी चिकित्सा) के विचार भारत के आयुर्वेदिक विचारों से मिलते हुए ही हैं । जो त्रिदोषपाद आपकी आयुर्वेद में मिलेगा वही आप हिपोकैटिस कै विचारों में पाइएगा । निदान की आत्रेय ओर सुश्रुतीय परिपाटी ही हिपोकेटिस को मान्य है । मुख की दुर्गध नष्ट करनेवाली जो औषधि हिपौझेटिस ने लिखी हे उसे स्पष्ट ही उसने “भारतीय औषध नाम से लिखा है । यूनानी विफित्सा साहित्य में आयुर्वेद कै ही रोम तथा औषधियों कै नाम कुछ ठेर-फैर कै साथ’ आप पाएँगे । उदाहरण कै लिए कुछ शब्दों को देखिए आयुर्वेद यूनानी जटा मौसी जतमनसी श्रृंगवेर जिंजिवेर स्थिती पेपेरी त्रिफला इत्रिफल कृष्ट कोस्तत् शर्करा सकरून यह तो कुछेक शब्दों का निदर्शन है यदि अघिक तुलना की जाए तो आप समस्त ग्रीक (यूनानी) चिकित्सा विज्ञान क्रो आयुर्वेद कै प्रभाव से अनुरंजित ही पाइएगा ।

हिपोक्रिटूस से पूर्ववर्ती अनेक ग्रीक विद्वान भी भारत आते रहते थे वह इतिहासज्ञों से छिपा नहीं है 1 एप्पीडोक्लीस जो हिपोक्रिटूस से भी कुछ पूर्व ग्रीक में एक प्रतिष्ठित विद्वान था, भारत के पश्चिमीय प्रांतों में रहकर भारतीय दार्शनिक एवं आयुर्वेदिक विचारों को अपने साथ ग्रीस में ले गया था ।1 पाइथागोरस नामक ग्रीक विद्धान भी भारत आया और भारतीय विचारों का… उसने भी ग्रीस में प्रचार किया था । ईसा से 326 वर्ष पूर्व यूनान कै सम्राट” सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था । यह चंद्रगुप्त मौर्य का प्रारंभिक युग था । यद्यपि सिकंदर पंजाब से आगे न बढ सका, क्योकि वीर भारतीयों ने रणस्यत्नी मैं उसके दोंत खटूटे कर दिए । परंतु इतनी ही दूर तक की अपनी विजय यात्रा सिकंदर के प्राय: तेरह लेखक-साथियों ने अत्तार-अलग लिखी है । वे सारे ही लेख जो आज क्या होते हैं, भारतवर्ष के सर्वागीण गौरव से भरे हुए हैँ ।

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