अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 5

भारत साम्राज्य की पूर्वीय सीमा भारतवर्ष से आ लगी यीहिंदूकुश पर्वत से लेकर काबुल, स्थित और कंधार आदि स्यान भारतवर्ष कै ही अतर्गत थे । चंद्रगुप्त मौर्य से परास्त होकर सैल्यूक्स ने अपनी पुत्री का’विवाह चंद्रगुप्त कें साथ कर दिया और अपना एक दूत भी चंद्रगुप्त कें राजदरबार में नियुक्त किया । इसका नाम मेगास्थनीज था । मैगास्थनीज बहुत समय तक पटना में रहा । अपने इस दीर्घकालीन भारत निवास में उसने भारत का अत्यंत विस्तृत वर्णन लिखा था । उसने लिखा हे कि भारतवर्ष में उस समय उपवनों में रहनेवाले श्रमणों की वहुत प्रतिष्ठा थी । इनके बाद दूसरे नंबर पर चिकित्सकों क्रो प्रतिष्ठा प्राप्त थी । वे श्रमण संन्याप्ती होते हुए चिकित्सक भी थे । हमने पिछली पंक्तियों में क्टेसियस नामक पर्शियन (ईरानी) राजवेघ का उल्लेख किया है । यह इंसा से 400 वर्ष पूर्व था । अपनी पुस्तक ‘इंडिया’ मेँ उसने भारतीय पौदों, कीडों, रंग, बंदर, हाथी और तोते आदि पक्षियों का उल्लेख किया हे । वह लिखता है कि भारतीयों को सिरदर्द, दंतशूल, अक्षिशोथ, मुखपाक और वण आदि रोग होते ही नहीं थे । इस प्रकार हम यह निस्सवदोच कह सकते हैं कि उत्तरकाल के प्रारंभ युग में भारतवर्ष ही चिकित्सा विज्ञान में समस्त विश्व का गुरु बना हुआ था और भारतीय स्वयं भी आयुर्वेद से पूरां-पूरां लाभ उठा रहे ये । भारतीय ही नहीं, “‘डीटूस’ नामक लेखक ने सिद्ध किया है कि यूनानी चिकित्सकों को भी भारतीयों के देयक ग्रंथों से अच्छा परिचय था और वे अपने उस भारतीय चिक्लिदृ विज्ञान के कारण, जो उन्हें प्राप्त था, अपने आपको धन्य तथा सफल समझते ये ।3 जब हम ग्रीस की बात करते हैं तब बेबीलोनिया, सीरिया और समस्त पश्चिमीय पर्शिया के छोटेच्छीटे राष्ट्र भी उसी में अंतर्मूत समझने चाहिए, ठीक उसी प्रकार भारतवर्ष का नाम लेने के साथ भी अफगानिस्तान, बिलोविस्तम्न तथा पर्शिया की भिन्नक्वेंमिन्न सत्ताओं को मूल जाना आवश्यक है । पेयोकि वे भारतवर्ष के ही प्रांत थे । ” पाश्चात्य ऐतिहासिकों के अनुसार सभ्यता के आदिम विकास स्यान सुमेरिया (दजला और फरात का दोआब) और मिश्र में (ई. पू. 6000 से 3000 के बीच ) सुपेत्यिन और सेमेटिक जातियों ने जिस सभ्यता को जन्म दिया था उसमें यद्यपि कॉंसा, ताँबा, सोना, चाँदी कं साथ-साय उस्कोदूभव लोह का ज्ञान तो था5 परंतु वे उसके साधारण फ्यूल उपयोग कै अतिरिक्त और कुछ न जानते थे र 2500 ई. पू. तक, जबकि सेमेब्लि जाति सुमेरिया, बेबीलोन, मिश्र, फिनीशिया तया क्रीट तक व्याप्त हो गई थी, इहै उस्कोदूभव लोह कै अतिरिक्त भूमि से लोहा प्राप्त करने की विधि का ज्ञान नहीं था 3 ई. पू. 1600 से लेकर 660 तक, प्राया एक हजार वर्ष के ब्रीच बेबीलोन मिश्र ओ१ मेसोपोटामिया (ईराक) की सभ्यता का बिकास हुआ था । इस समय यहॉ पर यधपि बेधक दिया क्या चिक्लिर का आविर्भाव हो चुका था परंतु धातुओं का प्रयोग बर्तनों, हथियारों क्या आभूषणों के लिए ही होता था 3 यह हमारे देश में यास्क, पाणिनि और वुद्धृ के समय तक सूत्रकात का युग था, जब तक्षशिला के विश्वविद्यालय द्वारा जनसाधारण तक धातुओं का रासायनिक विश्लेषण पराकष्ठा तक पहुंचा हुआ था । इस काल से कितने ही पूर्व सुमेरिया, बलख (ष्ठव्रआंद्रध्द) और पुष्कलावती (चारसदूदा) कै कांकायन तथा पौष्कलावत जैसे विद्धान काम्पिल्य और काशी में इन पदार्थों का उत्कृष्ट रासायनिक ज्ञान भारत से प्राप्त कर चुके थे । इंसा से सत्रहवीं शताब्दी से लेकर छठी शती पूर्व तक एक हजार वर्ष कै ब्रीच ईजियनों को पराजित कर ईं. पू. 8वीं शती में यूनानियों का’ उदय हुआ था, तब वे लोहे का प्रयोग जानते थे 3 इससे बहुत पूर्व आर्यो के वैज्ञानिक आविष्कार मेसोपोटामिया, मिस्र, सीरिया, वेबीलोनिया, क्रीट और स्वयं यूनान तक पहुंच चुके थे ।

जिस प्रकार पश्चिमोत्तर प्रदेश में उक्त संपूर्ण भूभाग के आयुर्वेद का विस्तार तक्षशिला के विश्वविद्यालय द्वारा हो रहा था, उसी प्रकार पूर्वीय भारत के समस्त क्षेत्र में काशी, नालंदाऔर विक्रमशिला कै विश्वविद्यालय ईसा की आठवीं शताब्दी तक अपूर्व कार्य कर रहे थे । हेनसांग ने लिखा हे कि अकेले नालंदा विश्वविद्यालय में दस सहत उपाध्याय, मिक्षु-आचार्य शीलभद्र के आचार्यत्व में विथिन्न विषयों की शिक्षा देते थे ।4 इनमें आयुर्वेद भी एक प्रधान विषय था । इन विद्यालयों का कार्यक्षेत्र भी कैथल भारतवर्ष कै अंदर ही सीमित न था, बल्कि पूर्वीय द्वीपसमूह, स्याम, इंडोचीन, ब्रटादेश तथा पीन आदि कै सुदूरवर्ती प्रदेश भी इनसे लाभ उठा रहे थे ।

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