अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 6

श्लोडिया (इंडोंचाइना’) में मिलनेवाले शिलालेखों से इस ओर के कार्यों पर बहुत प्रकाश षहुता हे । इस संबंध में भारतीय पोतकला फे इतिहास लेखक श्री राधाकूमुद मुखर्जी बै अपनी पुस्तक ‘1 शां हँसा। डागंह्माशिपु’ मैं बड्डे महत्व की बातें लिखीं हैं ! जिन लोगों का दिशा यह है कि भारतीय समुद्रयात्रा करते ही न ये, ये भ्रम में हैँ । समुद्रयात्रा को अधर्म कहनेवाले विचार भारत की वास्तविक संस्कृति में कभी भी समाविष्ट न थे । विजेता सिकंदर जब भारत से यूनान क्रो वापस गया उस समय उसने अपनी आधी से अधिक सेना को ‘नियार्कस’ के सेनापतित्व में लाल सागर पहुंचने की व्यवस्था की धी । इस सेना को ले जाने कं लिए भारत ने ही अपने जहाज दिए थे ।1 ये जहाज मामूली नौकाएँ न र्थी बल्कि उनका साधारण आयाम-प्रयाप्त इतना होता था जिसमें 800 से लेकर 1000 यात्री तक सुविधापूर्वक यात्रा कर सकत्ते थे ।

शल्य चिकित्सा क्रो ‘आसुरी चिकित्सा‘ कहकर तिरस्कार करनेवालों की भाँति ही समुद्रयात्रा को पाप कहनेवाले कायर विचार बहुत पीछे से पल्लवित हुए हैँ । वे क्यों पल्लवित हो सके, यह तो हम यहाँ नहीं सोचना चाहते, परंतु इसमें अणुमात्र भी सदेह नहीं है कि यह घृणित विचार भारतीयों की मौलिक संस्कृति के साथ कोई संबंध नहीं रखते । महाकवि कालिदास ने भारत का औषधि व्यापार पूर्वीय द्वीप समूहों से होने का उल्लेख किया हे ।3 कालिदास कं उल्लेख में यह स्पष्ट है कि कलिंग देश कैवंदृरगाहों पर पूर्वीय द्वीपों से लोंग आती थी । कलिंग देश आज़ कं मद्रास का उत्तरार्ध तथा उडीसा का सपूर्ण भाग मिलकर बना था । बालासोर, कटक, जगन्माथपुरी, धोली और तुषाली आदि स्यान कलिंग देश क ही अंतर्गत थे । जिन पूर्वीय द्वीपसमूहौं से भारत का इतना घनिष्ठ व्यवहार रहा है वे भारतीय सभ्यता से व्याप्त थे, इसेमें तनिक भी सदेह नहीँ । जावा मेँ ईसा की नवीं शती के सम्राट दक्ष तथा 13र्बी शती के रजससंग अपुर्वमूमि के मूर्तिकला संबंधी शिव तथा बोद्ध प्रज्ञापारमिता के संस्मरण देखिए 3 पूर्वीय द्वीपों में पैदा होनेवाले लवंग आदि औषधि द्रव्य भारतीय. वेयों की ही प्रयोगशालाओं ओंर औषधालयों में खर्च होते थे ।

ईसा कं बाद 5 25-650 वर्षों में गुप्त साम्राज्य के पतन के साथक्वेंसाथ अन्य देशों कै साथ भारत का व्यवसाय गिरने लगा । हमारे जहाजी बेड़े नष्ट होने लगे और देशांतरों से पौतमार्ग से स्थापित होनेवाले हमारे संबंध शिथिल होते चले गए । समय-समय पर आनेवाले यवन धाक्शाहीँ ने भारत की सीमाओँ को बद्ध करना प्रारंभ किया ३ क्या सुमात्रा आदि पूर्वीय भारत के उपनिवेशों पर भी उन्होंने अधिकार जमा लिया ५ क्या को सुविधाएँ वहाँ नष्ट हो गई र इसलिए समुद्र-यात्रा धीरेच्चिधीरे पाप बनती चली गई ३ अन्यधा गुप्त साम्राज्य में वुद्धघोष, कुमारजीव, दीपंकर श्रीज्ञान आदि न जाने क्लिहै ही बौद्धभिक्षुओं ने चीन, तिब्बत और जापान आदि पूर्वीय देशों में भारत के दाशंक्लि और वैज्ञानिक तन्दचों कर प्रचार किया था । 1 इन वैज्ञानिक तत्यों मेँ आयुर्वेद ही मुख्य या १ मटूटार हरिज्ञचंद्र, वररभट, इंदु, जेज्जट जैसे धुरंधर आयुर्वेदाचार्य इसी युग में हुए वे ३ गुप्तयुग की सभ्यता के चिह जावा, सुमात्रा, स्याम, कम्बोडिया, जापान एवं चीन आदि में अरज मी देखे जाते हैँ । यह सारा प्रसार स्थल मार्ग से ही नहीँ बल्कि पोतों द्वारा जलमार्ग से भी हुअर था 3 विशाल भारत कर यह वह स्वरूप है जो उत्तरकाल के प्रारंभ में विद्यमान था दृ आयुर्वेद का बिज्ञान इतने महान एवं विस्तीर्ण मानवीय जगत पर एकछत्र शासन कर रहा या 1 हमने पिछले ऐतिहासिक प्रमाणों क आधार पर देखा कि इस समय तक भी समस्त मानव जगत कर शिक्षक भारतवर्ष ही था । यूरोप, एशिया ओर अफ्रीका कं समस्त राष्ट्र प्राय: यहँ’र के प्रत्माचार्यों से ही अनुशासित होते थे । कहते हैँ कि यूरोप का सबसे पुराना औषधालय पेरिस में था । यह ईसा की ‘7वीं शताब्दी में बना था । कुछ लोगों की राय यह है कि वह चौथी शताब्दी में कग्रेर्स्टटाइन के समय में स्थापित हुअर था । इससे पूर्व यूरोप में रोगियों की वैज्ञानिक चिकित्सा का कोई प्रबंध न था ।

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