अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 7

ऐसी दशा में स्वयं भारतवर्ष के अंदर आयुर्वेद की अवस्था अत्यंत सुंदर और आदर्श होना आवश्यक शादान् बुद्ध के समय तक के आयुर्वेद का प्रतिबिंब हमने तक्षशिला के विश्वविधालय कुमार मत् जीवक के वर्णन में देखा है । इसके अनंतर प्राय2 300 वर्ष बाद हमें मौर्य के संस्मरणों में आयुर्वेद का जो इतिहास मिलता है यह मी उसके एक जीक्ति विज्ञान होने का परिचायक हे । कौटिल्य के अर्थशास्त्र से हमें इस स’वंघ में वहुत कुछ जानकारी आप लेती हे । हम धच्वंतरिं के समय की शासनन्धावस्था में यह देखते हैं कि उस क्या श्या कै हित और स्वास्थ्य की चिंता राजा का कर्तव्य था । इसीलिए घव्यंतरि ये लिखा है कि मूर्ख वेध लोगों को, जो प्रजा के स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं, फाँसी दे देनी चाहिए । चाणक्य के समय तक भी भारत की वह राज-व्यवस्था वहुत अंशों में विद्यमान धी । राजा प्रजा के हित साधन को अपना कर्तव्य मानता था । उसने लिखा है कि राजा को विलासिता छोडकर प्रजा कै हित में ही अपना हित समझना चाहिए 3 चाणक्य ने राज्यतंत्र के बीस विभाग और उनके संचालकों का उल्लेख किया है । इनमें काई दिमाग केवल प्रजा के स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए ही हैं तथा कुछ विभाग चिकित्सा द्रव्यों को सबित कर उचित मूल्य पर देयों को पहुंचाने का ही कार्य करते ये । उन विमानों के अध्यक्षों के कर्त्तव्य का विस्तृत उल्लेख भी हमें कौटिल्य के लेखों में मिलता है । समाहार एक प्रधान राजकीय विभाग था । इसका अध्यक्ष ‘समाहर्ता‘ कहलाता था । समस्त राजकीय आय इसी समाहर्ता कै अधीन होती यी 3 इस विभाग के अंतर्गत सात उपविभाग और ये, वे 1. दुर्ग, 2. राष्ट्र, 3. खनि, दृ. सेतु 5. वन, 6. ब्रज और 7. वणिक नाम से कहे जाते ये ।4 इन सातों विभागों में प्रथम और द्वितीय को छोडकर शेष श्चि विभाग आयुर्वेद अथवा स्वास्थ्य सचंघी प्रश्नों से सीधा संवंघ रखते ये । खनि विभाग द्वारा सोना, चाँदी, हीरा, मणि, मुक्ता, प्रवाल, सोल, नमक, पत्यर तथा रस (पारद) आदि खनिज द्रव्यों का ग्रहण होता था । ‘सेतु’ विशा में पुष्प; फल, बाटु षण्ड (लतावल्लरीं), व’ब्दमूल आदि पदार्थ आते थे । ‘व्रज’ बिभाग डाय गाय, मैस, बकरी, ऊँट, गधा, घोड़ा, खच्वर आदि पशुओं की व्यवस्था होती पी । ‘या‘ विभाग पशु-द्रव्य, मृग-द्रव्य हाथी आदि अन्यान्य जांगल द्रव्यों का मालिक था और दक्ति’ विभाग स्थल पथ और वारिपथ द्वारा होनेवाले व्यवसाय फी व्यवस्था किया क्या भा क्या व्यावहारिक वस्तुओं का आदानंप्रदान करने कै लिए ‘कुष्याध्यक्ष’ एक प्रधान अधिकारी क्या ‘द्रय्यपाल’ और ‘धनपाल’ उसके सहायक अधिकारी विख्या थे । इन अधिकारियों का मुख्य कर्तव्य ही यह था कि औषधि तथा फ्लॉधी क्या आदि मीण्याव्यों की व्यवस्था किया करें । शाक, साठी का घायल; अर्जुन, महुआ, क्लि, लोध. साप्यान, शीशम, खैर, खिरनी, शिरस, बिटूखदिर, देवदार, ताल, राल, जश्वकां, क्या; मांसरोहिणी, रोहिणी; आप्रप्रियक, भाव कै पुष्प आदि ओषधिद्रव्य तथा अनेक पत्र, पुष्प, सता. पेल, फल आदि जंगलों में उत्पन्न होनेवाले पदार्थों का संग्रह इन अधिकारियों की देखरेख में ही हुआ काता धा । देशी और विदेशी खरीदारों को ‘पण्याध्याइर‘ द्वारा बेचने की व्यवस्था की जाती थी । उपर्युक्त अधिकारी ही इन द्रव्यों से तैयार होनेवाली ओषधियाँ को कारखल्पों में तैयार कराते और देशर्नवेदेशों में विक्रयार्य भेजते ये । थल और जलमार्ग से होनेवाले व्यवसाय का उल्लेख तो पिछली पंक्तियों में किया ही जा चुका है । तैयार की गई औषधियों के बड़ेन्दड़े भंडार बने रहते थे जिनमें प्रत्येक औषधि सुरक्षित रुप से बहे परिमाण में रखी जाती थी । ये क्रोषगृह भी बड़े वैज्ञानिक ढंग के मने हुए रहते थे । मनु के समय कै तुल्य ही हम देखते हैं कि ओषधियों की व्यवस्था करना इस युग में भी राजा कै र्क्सव्यों में ही समाविष्ट या । इस प्रकार आयुर्वेद की शिक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था का भार वैद्य पर नहीं, बल्कि राजा के अधीन रहने की ही भारतीय परिपाटी हमें इतिहास में मिलती है क्योंकि बिना राजकीय सहयोग के चिविस्सा-विज्ञान सफलतापूर्वक हर कोई नहीं पढ़ सकता, और बहुव्ययक्वेंसाध्य औषधियों तथा यंत्रों का संग्रह बिना राजकीय सहायता के जन-साधारण की शक्ति से नाहर है । चिकित्सा का यह सुदर प्रबंध भारतीयों के लिए तो था ही, विदेशियों के लिए पी किया जाता था । मैगस्यनीज ने पाटलिपुत्र कै स्वशासन का जो उल्लेख किया है, उससे यह स्पष्ट है कि प्रत्येक नगर में स्वागत गृह वने हुए ये । इनमे ज्जवदाशयों के ठहरने का पूरा प्रवंध था । यदि कोई विदेशी अतिथि बीमार हो जाता था तो उसकी चिकित्सा कै लिए एक पैघ नियुक्त रहता था । उसके पथ्य, भोजन और अन्य आहार‘बिहार का भी प्रबंध था । मृत विदेशी कै शय को भूमि में गाइ दिया जाता था । इस दिमाग से भी गा का आप ढोती यी । यह जाय देश कै दीन और अनाथ व्यक्तियों को क्तिक्ति की वी र षांतु यह धन यों ही प लुटाया क्या या पल्लि क्तों हलके-स्लो काम दिए जाते मे र षबॉं डारा मूत क्या कर देना मुख्य था । इस

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