अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 8

सारी व्यवस्था के लिए एक राजकीय स्थापित होती थी । एक समिति के कार्य के लिए भी वी कि यह वेश रखा जाता था । तुदर प्रवंध था कि वह आज तक किसी राजकीय शासन में नहीं हो सका 3 चंद्रगुप्त ने “धर्मस्यीय’ और ‘कंटक शोधन’ नाम कै दो प्रकार के न्यायालर्यों की स्थापना की मी । प्रथम प्रकार कै न्यायालय जनता के नागरिक और व्यक्तिगत स्वत्व एवं अधिकारों कौ रक्षा के लिए ये, तथा दूसरे “कंटक शोधन’ न्यायालय राजकीय एवं सामाजिक नियमों के अतिक्रमण करनेवालों के दंड बिधानार्थ कार्य करते ये । कंटक शोधन न्यायालय में एक वैद्य नियुक्त रहता था जो संदिग्ध दशा में कन्याओं पर बलात्कार होने या न होने का निर्णय करता था । मृत व्यक्ति कै शव की परीक्षा (न्थिइत्माशांआग्र) द्वारा वह यह निश्चय करता था कि मृत्यु का कारण क्या हे? इन्हीं निर्णयों के आधार पर न्यायालय पैल्लला विल्मा काते थे ।

उस समय बच्चों, बूडों, कठिन रोगियों, धनहीन व्यक्तियों तथा अनाथों कै लिए ऐसी राजकीय संस्थाएँ थीं जहाँ उनके हर प्रकार कै कष्ट निवारण फे लिए राजा प्रबंध करता था । उन्हें ओषधियाँ, पथ्य भोजन, वस्वादि मुफ्त दिए जाते ये । इस प्रकार उन्हें स्वस्थ बनाकर इस योग्य कर दिया जाता था कि वे काम करने योग्य हो जाएँ । काम करने बातों को राज्य की ओर से यथायोग्य काम दिया जाता था । तत्कालीन भारत में आयुर्वेद के अष्टा’ग विभाग को दृष्टि में रखकर कई प्रकार के चिकित्सालय स्थापित लिए गए ये ।3 उन समस्त चिकित्सालयों के साथ एक मैंषज्यागैर होता था । इसमें प्रचुर परिमाण में औषधियों का संग्रह रहा करता था । कौटिल्य वो अनुसार नगर के उत्तर-पश्चिम में यह ओषधिशाला होनी चाहिए 3 इन शालाओं में ओषधियाँ तथा अन्य उपकरण इतने अधिक होते ये कि निरंतर व्यय होते रहने पर भी वे एक वर्ष तक समाप्त न हो सकें । उनमें जोलो वस्तुएँ पुरानी हों उन्हें हटाकर वर्ष वो भीतर ही नई वस्तु उनके स्थान पर रखी जाए, इसका विशेष ध्यान रखा जाता था । कौटिल्य ने इनं मैपन्यागारों का विस्तृत और विशद उल्लेख किया हे ।

आयुर्वेद कै अष्टा’ग दिमाग कै अनुसार उल युग में निम्म दिमागों मैं चिक्रित्सक्ति वै’टे हुए थे…

र . चिधकू चिकित्सालय1 -थिषवड्डू साधारणता काय चिकित्सक होते ये ३

2. जणित्नीविद बिकिंत्सालर्यों-जगिलीदिद बिष चिकित्सा में प्रवीण वेध को क्या

ये । इन चिकित्सालयों मैं चिपों की ही चिकित्सा होती यी । 1 ‘गर्म व्याधि सस्था‘3-गर्भ सबैंधी रोगों की चिकित्सा का प्रबंध इन क्या

में होता था । ९. सूतिका चिकित्सालयों-प्रसव से लेकर तत्संबंधी पूर्ण चिकित्सा के लिए र

उपर्युक्त विभागों में प्रथम कहे गए भिषकू चिकित्सालयों में शल्य, शालाक्य रसायन तथा काय चिकित्सा इन तीनों ही अंगों का समावेश प्रतीत होता हे । विष चिकित्सा कै अनेक महत्त्वपूर्ण उल्लेख देखने से यह प्रगट होता है कि यह विज्ञान इस नुग में विशेषता उन्नत और उपयोगी था । सिकंदर ने भी भारत में आकर जो चिकित्सा का आश्चर्य विष वेयों कै पास देखा वह अन्यत्र न था । यही कारण था कि इस युग कै नवीन कौशल के रूप में बिष चिकित्सा को देखकर सिकंदर विशेषतट्वे चिप वैधों को अपने साथ यूनान तक ले गया था । शेष भूत विद्या, वाजीकरण एवं कौमार मृत्य का संबंध तीसरे और चौथे विभाग के अंतर्गत ढोता हे । इन चिबिक्सालयों कै अतिरिक्त मोडा, हाथी तथा बैल आदि विविध पशुओं कै लिए पशु चिकित्सालय भी उस युग यें स्थापित ये । इनमें पशुओं दो स्वास्थ्य तथा नस्ल की उन्नति कं लिए उत्तमोत्तम उपाय किए जाते ये 3 इन संपूर्ण विषयों की शिक्षा का प्रबंध पूर्व में काशी और पश्चिम में तक्षशिला कै विश्वविघालयों में था ।

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