अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 9

मौर्य युग तक चिकित्सा कार्य में पुरुषों का ही नहीं, स्त्रियों का भी साथ था । शिविरों में रोगियों की औषधि तथा पथ्य आदि की सेवा करने स्त्रियों कै लिए स ही रहा करती थीं । धात्री (श्वश्या) ओंर परिचारक (क्या) दीनों ही काम सँभालती थी । चिकित्सा का प्राय: सास सामान उन्हीं कै अधिकार यें रस्ता था र सेना जय कहीं युछादि कै लिए मी जाती तो ये स्त्रियां अपनी डूयूटी पर उसके साथ जाया करती थीं । कौटिल्य ने लिखा है कि यंत्र शस्त्र ओषधियाँ, वृत, तेल एवं वस्त्र आदि उनके अधिकार मैं पर्याप्त रहते थे ।

यह तो राजकीय बिभाग में कार्य करनेवाले वेधो का वर्णन दुआ । स्वतंत्र रुप से पिकित्सा करनेवाले वेधों का अनुशासन भी राज्य की ओर से होता था । इन आवश्यक नियमों ये’ स्वतंत्र अथवा राजकीय, सभी वैद्य परतंत्र ये । चाणक्य ने लिखा है कि यदि सरकार को सूचना दिए बिना चिकित्सक लोग ऐसे रोगी की चिकित्सा करने लगे जिसकी मृत्यु की संभावना हो तो उन्हें पूर्ण साहस दंड दिया जाए, जिसमें जुर्माना और कैद दोनों सम्मिलित हैँ । यदि किसी विपत्ति के कारण वेध रोगी का ठीक-ठीक इलाज नहीं कर रहा है तो उसे मध्यम दंड (कैद या जुर्माना) का भागी होना पड़े और यदि जानबूझकर त्तोभादि के कारण चिकित्सा में उपेक्षा की जा रही ही तो चिकित्सक को ‘र्दइमाँल्या’ या कठोर कारावास का अपराधी समझा जाए । इस प्रकार चिकित्सापद्धृति को अधिक से अधिक निर्दोष ओर रोगी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण बनाने कै लिए ही इन सब नियमों का निर्माण किया गया था ।

पैसों को अच्छी से अच्छी ओषधियाँ मिल सकें इसके लिए राज्य की ओर से औषधियों के उत्पादन का प्रबंध था । कौटिल्य ने औषधियों के उत्पादन के लिए राज्य की और से कुछ भूमि अलग छोड देने का उल्लेख किया है ओर जो अधिक जल चाहने बाली जड्रीन्दूटिर्यों हों उन्हें खास प्रकार फे गमलों में लगाए जाने का निर्देश किया है । इस माँति राजकीय विभाग द्वारा जंगलों से संगृहीत तथा नगरों से उत्पन्न की गई आँधियों की प्रचुरता के कारण नईं और निर्दोष औषधि के प्रयोग पर ही अधिक जोर दिया बाता था । यह विशेष ध्यान रखा जाता था कि दुकानदार पुरानी और दूषित वस्तुएँ न मेधने पाएं । अर्थशास्त्र में लिखा है कि मिलावटी माल को अच्छा कहकर अथवा श्या कों अच्छा था बदले में लिए हुए पदार्थ को अपना होने का विश्वास दिलाकर पेघने बालों पर कप से कप 54 पण दंड दीना चाहिए ।1 थान्य; स्नेह (धी, तेल आदि) शा साप, गंध (इत्र आदि) और दवाई कै द्रव्यों क्रो जो लोग नकली तीर पर मेवे, अयांत् राजकर्मधारियों द्वारा प्रमाणित शुद्ध चीजों कै स्थान में बनावटी वस्तुओं का विक्रय कां तो । पप दंड और होना चाहिए । इस सुदर अनुशासन का हीं यह फल था कि भारतीय जनता का स्वास्थ्य वहुत उन्नत था । आज अधिकांश रोग घरों मैं सड्रीगली और फ्लो वस्तुओं के रुप में बाजार से मील आते हैँ और हमारी जीवन शक्ति को नष्ट करते जाते हैं ५ भारतीय संस्कृति और शासन की दृष्टि से यह राजा का ही अपराध है । उत्तर कात के इस प्रारंभिक युग में भी भारतीयों की व्यावहारिक वस्तुएँ इतनी शुद्ध और निर्दोष यीं कि विदेशी लोग भी उन्हें खरीदने के लिए लालायित रहते थे । यहाँ तक कि भारतीय इत्र और औषधियों के समान शुद्ध द्रव्य संसार कै दूसरे किसी देश में न होने के कारण ही मिस्र और ग्रीस (यूनान) आदि देश इन्हें प्रचुर परिमाण में भारत से ही लेते वे और बदले में अपने यहाँ का सुवर्ण दिया करते थे । ऐतिहासिकों का यह निश्चित बिस्वास हे कि उपर्युक्त वस्तुएँ जो हजारों वर्षों तक पश्चिमीय देशों को मारत ने दी हैं विश्व में दूसरी जगह अलभ्य थीं ।

उपर्युक्त सारी बातें केवल सिद्धांत की ठी नहीं, बुल्कि व्यवहार सिद्ध र्थी । मैगस्यनीज ने इस बात का समर्थन किया हे ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *