अर्वाचीन आयुर्वेद

“जो रोगी की सेवा करता है, वह मेरी सेवा करता है ।’ इन उदार शब्दों के साथ मगवान् बुद्ध ने उत्तरकालीन युग की आधारशिला रखी थी । यही कारण हैकि हम आयुर्वेदिक विकास को दृष्टि से उत्तरकाल क्रो मध्यकाल से अधिक सीमाग्यशाली पाते हैँ । यह ठीक हे कि हम भगवान् बुद्ध को प्राणाचार्य नहीँ कह सकते, परंतु उन जैसे युग प्रवर्तक महापुरुषों का जीवन तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक प्रत्येक शाखा में ओत-प्रोत रहता है । उनका व्यापक व्यक्तित्व तत्कालीन राष्ट्र की प्रत्येक वस्तु में चेतना की भाँति प्रतीत होता है । राष्ट्र का एक-एक तत्व उनकी आलोचनाओं से परिमार्जित तथा उनके विचारों से नवीन रफूतिं प्राप्त करता है । इसलिए भारतवर्ष के उत्तरकालीन युग वो किसी विषय पर विचार करते हुए हम भगवान बुद्ध देव क्रो अलग नहीं रख सकते । आयुर्वेद का भी वही हाल है । मध्यकाल के महापुरुषों की भाँति भगवान् बुद्धदेव ने भी आयुर्वेद को उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि मनुष्य जीवन के लिए उसे एक आवश्यक विज्ञान समझकर गौरव प्रदान किया । कुमार भहं जीवक जैसे आयुर्वेदज्ञों की प्रतिष्ठा की ओर रोगियों की सेवा को अपने मिशन का मूल मंत्र घोषित करके आयुर्वेद कै पुनर्चिकास का मार्ग प्रशस्त कर दिया । इसका ही यह परिणाम हुआ कि भगवान बुद्ध के अनुचरों ने धार्मिक भावनाओं से अनुप्राणित होकर जहाँ अन्य अनेक सस्मरणीय कार्य किए वहाँ आयुर्वेद कै अम्युदय के लिए भी अपने जीवन का अमूल्य समय अर्पित किया । इसीलिए हम देखते हैँ कि महाभारत के बाद प्राय: ढाई हजार वर्ष तक आयुर्वेद में नवीन आविष्कारों का जो क्रम प्राय: बंद हो चुका था, वह इस युग में फिर से क्रियात्मक रूप मेँ आ गया और आदिकाल के हजारों वर्षों बाद आयुर्वेद का वैभव एक नवीन रूप लेकर फिर से प्रकट हुआ ।

अमर बोधिवृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त कर भगवान् गौतमबुद्ध ऋषिपत्तन (सारनाथ) आए ओर भूले हुए संसार को सबसे प्रथम उपदेश दिया’भिक्षुओ संन्यासी को चाहिए की वह इनका सेवन न करे । कौन से दो अंत? एक तो यह जो काम और वीषय वासनाओं का जीवन हे, जो अन्तय है , प्राप्य, अनार्य और अनर्थकर है । और दूसरा यह जो शरीर को व्यर्थ हीं पीड़ा पहुँचाना, क्योंकि यह भी अत्यंत हीन, ग्राम्य, अनार्य और अनर्थकेर है ।

जीवन का मूल्य कुछ न समझने वाले मध्यकालीन दार्शनिक विचारों का कितना सुदर संशोधन तथागत के इन शब्द में है । यह उपदेश ही प्रकट करता हे कि भगवान् बुद्ध से पूर्व के प्रचारक भिक्षु, विलासी संसार को विषय भोग से निकालकर इस शरीर को शीत ओर आतप में विनष्ट कर देने से अधिक और कुछ न बता सकै । परंतु तथागत की यह “मध्यमावृत्ति’ संसार का व्यावहारिक मार्ग या । “संसार में कुछ करने के लिए जीवित रही’ यही उसका आशय हे । प्राचीन औपनिषद विचारों की मानो यह पुनरावृत्ति पी, जिनमें बताया गया था कि ‘तुम सौं वर्ष जियो और कर्मवीर बनकर रही ।’ मरने से जीना कहीँ अच्छा है क्योंकि वह कुछ करने के लिए हे । परंतु कुछ करने के लिए स्वस्थ शरीर की ही आवश्यकता है, इसीलिए तथागत ने कहा, “शरीर क्रो व्यर्थ पीड़ा पहुंचाना, ग्राम्य, अनार्य और अनर्थकर है ।’ शारीरिक जीवन की सुरक्षा के लिए शरीर का बिज्ञान आवश्यक हो जाता है ।” शारीरिक बिज्ञान और आयुर्वेद दो वस्तुएँ नहीं, एक ही हैं । जिसने शरीर को तत्त्वत जान लिया, समझ लो, वह आयुर्चेदज्ञ हो गया । महर्षि आत्रेय का यह वाक्य तथागत कं उपदेशों में कितना अधिक प्रतिविंबित होता हे, ‘जिसने शरीर को सर्वथा जान लियाहूँ समझो उसने आयुर्वेद को संपूर्ण जान लिया । इसीलिए हम देखते हैँ कि भगवान् बुद्ध ने दुखितों के आत्मिक कृषाय ही नहीं, शरीर के मल और मूत्र जैसे कषाय भी धोए हैँ । क्योंकि वे जानते थे कि स्वस्थ शरीर से ही घर्म, वयं, काम और मोक्ष सिद्ध हो सकते हैं ।

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