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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 15

भारतीय दैवी देवताआँ कै माप कै साथ पल्लवित दुआ । चिकित्सा का मंत्रयान में पदार्पण और उसक अनुसंधान पवमान में कुछ लोग ऐसे भी ये जो प्राचीन चिकित्सा द्रव्यों का भी उपयोग करते थे और अंधभक्तों के लिए मंत्रन्तंत्रों का भी । उनक बेज्ञानिक परीक्षण इन द्रव्यों पर किसी न किसी रुप में चलते ही …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 14

मुद्राराक्षस के कथानक से यह मी जान सकते हैं कि चाणक्य ने विरोधियों को बिष देने के लिए ‘तीक्ष्य रसदायी’ पैघों का मी उपयोग कितनी ही बार किया है । गुप्तचरों का साधारणता कार्य यहीँ, दान, सत्य. शीष, मृदुता ओंर साधुता लोगों में पढे । कुछेक सुधारवादियों ने अशोक से पूर्व इन्हीं पाखडपूर्ण मतभेदों कै …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 13

मणि भेद भारत कै निम्म प्रदेशों से प्राप्त ढोते ये” 1. सभाराष्ट्रक हीरक-विदर्भ (बरार) देश के अंतर्गत सथाराष्ट्र देश से प्राण र 2. काश्मीर रांष्ट्रक-काश्मीर देश से प्राप्य । 3. मध्यम राजक-कोशल देश कै अंतर्गत “मध्यम राष्ट्र‘ या मध्यदेश से प्राप्य ; 4. श्री कटनक-वेदोत्कट पर्वत से प्राप्य । 3. मणिमंतक-मणिमंत पर्बत से प्राप्य । …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 12

कच्ची धातु को पकाकर उससे पारा निकालना आना चाहिए । मणियों कै रंगरूप की पहचान होनी चाहिए । यदि वह यह बातें स्वयं न जानता हो तो वेसे विशेषज्ञ को अपने साथ रखे । शा में अंतर्निहित खानों को कच्ची धातु के भार, रंग; उग्र गंध तथा स्वाद के द्वारा पहवल्ला हो उस विभाग के …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 11

अब यह क्रमिक महत्व बिलकुल उल्टा हो गया था । इस युग में उसका क्रम शस्त्र 1. पार्थिव द्रव्य-सोनर, पाँदी आंद्रेक्ष हैमवतन्मथ (स्पिरलय की ओर उत्तरी व्यापार मागं) दक्षिण-पथ (दक्षिण भारत कै व्यापार मागं) से अच्छा है क्योंकि उसके द्वारा ही हाथी, घोड्रे, गंध द्रव्य, हाथीदाँत, क्या, चाँदी, सोना आदि बहुमूल्य एवं कंबल, ऊन, वन्य …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 10

विकृत परिस्थिति से प्राणी हीं रोगी नहीं डी जाते, वल्कि ओषधियाँ मी रोगी हीं जाती हैं । अतएव आप्रेय का प्रधान आग्रह यह है कि दूषित परिस्थिति उत्पन होने से पूर्व ही औषधियों का संग्रह करके रखा जाए ताकि ये दूषित तत्वों से अमिव्याप्त न हाँ । विशेषता क्यों औषधियों का प्रयोग सामूहिक रोगों में …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 9

मौर्य युग तक चिकित्सा कार्य में पुरुषों का ही नहीं, स्त्रियों का भी साथ था । शिविरों में रोगियों की औषधि तथा पथ्य आदि की सेवा करने स्त्रियों कै लिए स ही रहा करती थीं । धात्री (श्वश्या) ओंर परिचारक (क्या) दीनों ही काम सँभालती थी । चिकित्सा का प्राय: सास सामान उन्हीं कै अधिकार …

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अर्वाचीन आयुर्वेद

“जो रोगी की सेवा करता है, वह मेरी सेवा करता है ।’ इन उदार शब्दों के साथ मगवान् बुद्ध ने उत्तरकालीन युग की आधारशिला रखी थी । यही कारण हैकि हम आयुर्वेदिक विकास को दृष्टि से उत्तरकाल क्रो मध्यकाल से अधिक सीमाग्यशाली पाते हैँ । यह ठीक हे कि हम भगवान् बुद्ध को प्राणाचार्य नहीँ …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 2

विनय पिटक में भगवान् बुद्ध ने विस्तारपूर्वक औषधियों के निमणि, सेवन ज्या वितरण की व्यवस्था की है । उसमें न केवल जड्री-बूटियों ही, बल्कि घृत, मधु. क्यों, कषाय, फलन्मत्र, गोंद, लवण, चूर्ण, मांसडरक्त, धूम्रपान, नस्य और मध आदि समी फ्तार्यों की ओषच्युपयोगी व्यवस्था है । स्वेद, ‘वीर-फाड, बिष चिकित्सा, भूतदिधा आदि कितने ठी महत्त्वपूर्ण आयुर्वेदरिगें …

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अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 8

सारी व्यवस्था के लिए एक राजकीय स्थापित होती थी । एक समिति के कार्य के लिए भी वी कि यह वेश रखा जाता था । तुदर प्रवंध था कि वह आज तक किसी राजकीय शासन में नहीं हो सका 3 चंद्रगुप्त ने “धर्मस्यीय’ और ‘कंटक शोधन’ नाम कै दो प्रकार के न्यायालर्यों की स्थापना की …

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