अनोखे आर्टिकल

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 15

भारतीय दैवी देवताआँ कै माप कै साथ पल्लवित दुआ । चिकित्सा का मंत्रयान में पदार्पण और उसक अनुसंधान पवमान में कुछ लोग ऐसे भी ये जो प्राचीन चिकित्सा द्रव्यों का भी उपयोग करते थे और अंधभक्तों के लिए मंत्रन्तंत्रों का भी । उनक बेज्ञानिक परीक्षण इन द्रव्यों पर किसी न किसी रुप में चलते ही …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 15 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 11

अब यह क्रमिक महत्व बिलकुल उल्टा हो गया था । इस युग में उसका क्रम शस्त्र 1. पार्थिव द्रव्य-सोनर, पाँदी आंद्रेक्ष हैमवतन्मथ (स्पिरलय की ओर उत्तरी व्यापार मागं) दक्षिण-पथ (दक्षिण भारत कै व्यापार मागं) से अच्छा है क्योंकि उसके द्वारा ही हाथी, घोड्रे, गंध द्रव्य, हाथीदाँत, क्या, चाँदी, सोना आदि बहुमूल्य एवं कंबल, ऊन, वन्य …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 11 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 9

मौर्य युग तक चिकित्सा कार्य में पुरुषों का ही नहीं, स्त्रियों का भी साथ था । शिविरों में रोगियों की औषधि तथा पथ्य आदि की सेवा करने स्त्रियों कै लिए स ही रहा करती थीं । धात्री (श्वश्या) ओंर परिचारक (क्या) दीनों ही काम सँभालती थी । चिकित्सा का प्राय: सास सामान उन्हीं कै अधिकार …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 9 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 2

विनय पिटक में भगवान् बुद्ध ने विस्तारपूर्वक औषधियों के निमणि, सेवन ज्या वितरण की व्यवस्था की है । उसमें न केवल जड्री-बूटियों ही, बल्कि घृत, मधु. क्यों, कषाय, फलन्मत्र, गोंद, लवण, चूर्ण, मांसडरक्त, धूम्रपान, नस्य और मध आदि समी फ्तार्यों की ओषच्युपयोगी व्यवस्था है । स्वेद, ‘वीर-फाड, बिष चिकित्सा, भूतदिधा आदि कितने ठी महत्त्वपूर्ण आयुर्वेदरिगें …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 2 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 8

सारी व्यवस्था के लिए एक राजकीय स्थापित होती थी । एक समिति के कार्य के लिए भी वी कि यह वेश रखा जाता था । तुदर प्रवंध था कि वह आज तक किसी राजकीय शासन में नहीं हो सका 3 चंद्रगुप्त ने “धर्मस्यीय’ और ‘कंटक शोधन’ नाम कै दो प्रकार के न्यायालर्यों की स्थापना की …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 8 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 7

ऐसी दशा में स्वयं भारतवर्ष के अंदर आयुर्वेद की अवस्था अत्यंत सुंदर और आदर्श होना आवश्यक शादान् बुद्ध के समय तक के आयुर्वेद का प्रतिबिंब हमने तक्षशिला के विश्वविधालय कुमार मत् जीवक के वर्णन में देखा है । इसके अनंतर प्राय2 300 वर्ष बाद हमें मौर्य के संस्मरणों में आयुर्वेद का जो इतिहास मिलता है …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 7 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 6

श्लोडिया (इंडोंचाइना’) में मिलनेवाले शिलालेखों से इस ओर के कार्यों पर बहुत प्रकाश षहुता हे । इस संबंध में भारतीय पोतकला फे इतिहास लेखक श्री राधाकूमुद मुखर्जी बै अपनी पुस्तक ‘1 शां हँसा। डागंह्माशिपु’ मैं बड्डे महत्व की बातें लिखीं हैं ! जिन लोगों का दिशा यह है कि भारतीय समुद्रयात्रा करते ही न ये, …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 6 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 5

भारत साम्राज्य की पूर्वीय सीमा भारतवर्ष से आ लगी यीहिंदूकुश पर्वत से लेकर काबुल, स्थित और कंधार आदि स्यान भारतवर्ष कै ही अतर्गत थे । चंद्रगुप्त मौर्य से परास्त होकर सैल्यूक्स ने अपनी पुत्री का’विवाह चंद्रगुप्त कें साथ कर दिया और अपना एक दूत भी चंद्रगुप्त कें राजदरबार में नियुक्त किया । इसका नाम मेगास्थनीज …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 5 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 4

सिकंदर की विशाल सेना मैंकतिपय, यूनानी वेध भी थे, पस्तु अनेक ऐसे रोग ये जिनकी चिकित्सा वे न कर सकै । परंतु सिकंदर ने भारत में आकर र्देखा कि भारतीय वेय उनकी चिकित्सा सफलतापूर्वक करते थे । अतएव उसने अपने विजित प्रदेश में से भारतीय चिकित्सकों क्रो ही सेना के चिकिंत्सार्थ ऊँचेऊँचें पदों पर प्रतिष्ठित …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 4 Read More »

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 3

दूत वाक्या में एक घटना यों भी लिखी हे-“एक ब्राह्मण कुमार बहुत गरीब घर में क्या था । उसे शिक्षा की बहुत लगन थी । वह तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढने का रुठुत इच्छुक था । पर “आचार्य भाग’ या विश्वविद्यालय की नियत फीस कहौं से तातार अत: उसने प्रतिज्ञा को कि शिक्षा समाप्त होने पर …

अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 3 Read More »

error: Content is protected !!