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मोदी करेंगे ट्रंप से सीधी बात चीन से लेकर H1 B वीजा जैसे कई मुद्दों पर

Image result for modi trumpप्रधानमंत्री  मोदी 26 जून को अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप से मुलाकात करेंगे। ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने के बाद दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों की यह पहली मुलाकात होगी। इस मुलाकात के लिए पीएम मोदी 25 जून को अमेरिका जाएंगे। दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों के बीच होने वाली इस मुलाकात से काफी उम्‍मीदें लगाई जा रही हैं।


 कुछ विवादित मुद्दों के साए में होने वाली यह मुलाकात बेहद खास होगी। गौरतलब है कि दोनों नेताओं के बीच अब तक कम से कम तीन बार फोन पर बात हो चुकी है। आपको बता दें कि ओबामा प्रशासन के दौरान पीएम मोदी की बराक ओबामा से रिकार्ड आठ बार मुलाकात हुई थी। पीएम मोदी ने वाशिंगटन का तीन बार दौरा किया था, जबकि साल 2015 में ओबामा की ऐतिहासिक भारत यात्रा हुई थी, जिसमें वह गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे। पीएम मोदी की इस यात्रा को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने पहले ही साफ कर दिया है कि उनका देश भारत को बड़े रक्षा भागीदार के तौर पर मानता है। मैटिस के मुताबिक अमेरिका नई चुनौतियों के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया में आतंकवाद के प्रसार से बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए नए तरीके तलाश रहा है।

पेरिस समझौते से अलग हुआ अमेरिका

आपको याद होगा कि कुछ ही समय पहले अमेरिकी राष्‍ट्रपति ने पेरिस समझौते से खुद को अलग कर लिया था। उन्‍होंने इसका ठीकरा भारत और चीन पर फोड़ा था। उनका आरोप था कि भारत ने इस समझौते पर हस्‍ताक्षर सिर्फ इसलिए किए हैं क्‍योंकि इसके तहत उसको अरबों डॉलर मिलेंगे। हालांकि, उनके इस बयान के बाद भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने साफ कर दिया था कि भारत ने किसी लालच में इस समझौते की ओर कदम नहीं बढ़ाया है। उन्‍होंने यह भी साफ कर दिया था कि भारत आने वाली पीढ़ी को एक स्‍वच्‍छ वातावरण और साफ सुथरी धरती देना चाहता है जो प्रदूषण से मुक्‍त हो। इसी तरह का बयान खुद पीएम मोदी ने भी दिया था। 26 जून को होने वाली इस मुलाकात से पहले पीएम मोदी हैंबर्ग में जी 20 सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेने भी जाएंगे। यहां पर भी दोनों देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्षों के बीच मुलाकात की संभावना है। 26 जून को अमेरिका में होने वाली बैठक में कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भारत अपना विरोध स्‍पष्‍ट रूप से अमेरिका के समक्ष दर्ज कराएगा।

एच1बी वीजा

दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों की मुलाकात के दौरान यह मुद्दा सबसे बड़ा होगा। इसका सीधा ताल्‍लुक उन लाखों भारतीयों से है जो आईटी समेत विभिन्‍न क्षेत्रों में काम कर अमेरिका के विकास में अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। ट्रंप ने राष्‍ट्रपति का पद संभालने के तुरंत बाद जिन मुद्दों पर अहम फैसले लिए थे उनमें से यह भी एक था। वीजा नियमों में बदलाव की शुरुआत कर ट्रंप ने यह साफ कर दिया कि आने वाले दिन भारत के लिए अच्‍छे नहीं होंगे। इस फैसले के बाद वहां काम कर रहे भारतीयों में अपने भविष्‍य को लेकर अनिश्चितता दिखाई देने लगी थी। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के बाद भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने अमेरिका को कड़े स्‍वर में कहा था कि कई अमेरिकी कंपनियां और अमेरिकी भी भारत में नौकरी करते हैं। गौरतलब है कि एच 1 बी वीजा का इस्‍तेमाल अधिकतर भारतीय नागरिकों द्वारा ही किया जाता है। इनमें से अधिकतर आईटी सेक्‍टर से जुड़े हैं। भारत के लिए विदेशी मुद्रा पाने का यह भी अहम स्रोत है।

आतंकवाद का मुकाबला

आतंकवाद के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच काफी लंबे समय से बात होती रही है। लेकिन इसका बहुत ज्‍यादा असर अब तक दिखाई नहीं दिया है। ओबामा प्रशासन के दौरान भी इस मुद्दे पर कई बार बातचीत हुई थी, इसके बाद भी अमेरिका ने पाकिस्‍तान को फंड देना बंद नहीं किया। हक्‍कानी नेटवर्क के नाम पर अरबों का फंड पाने वाला पाकिस्‍तान आज भी आतंकियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बना हुआ है। इसका जीता जागता उदाहरण हाल ही में वैश्विक मंच पर पाकिस्‍तान के मंत्री द्वारा दिया गया वह बयान है जिसमें उन्‍होंने कहा था कि आतंकी मुल्‍ला उमर कभी भी पाकिस्‍तान से बाहर नहीं गया है।
उनके इस बयान ने यह साबित कर दिया कि पाकिस्‍तान किस तरह से आतंकियों को अपने यहां पर न सिर्फ सुरक्षित पनाह देता है बल्कि उन्‍हें आतंकी नहीं समाज सेवक मानता है। इस बार भारत को इस दिशा में प्रगति होने के कुछ आसार इसलिए भी दिखाई दे रहे हैं क्‍योंकि हाल ही में डोनाल्‍ड ट्रंप ने अपनी सऊदी अरब यात्रा के दौरान यह साफ किया था कि भारत आतंकवाद से पीडि़त देश है। रियाद में हुए सऊदी-अमेरिकी बिजनेस सम्‍मेलन में पाकिस्‍तान को न सिर्फ बोलने से रोक दिया गया था बल्कि ट्रंप से भी पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री की मुलाकात नहीं हुई थी। 26 जून को ट्रंप से होने वाली मुलाकात के दौरान पीएम मोदी पाकिस्‍तान पर प्रतिबंध को लेकर मुद्दा उठा सकते हैं। इस तरह की मांग कई बार अमेरिकी सीनेटर्स द्वारा भी की जाती रही है।


आथर्कि प्रगति को बढ़ावा देने

दोनों देशों के बीच व्‍यापार बढ़ाने को लेकर भी यह वार्ता अहम होने वाली है। यह इसलिए भी खास होगी क्‍योंकि ट्रंप अमेरिकी फर्स्‍ट की जिस नीति पर चल रहे हैं वही भारत मेक इन इंडिया पॉलिसी  पर आगे बढ़ रहा है। भारत में उद्योगों को बढ़ावा देने और स्‍वदेशी तकनीक के दम पर आगे बढ़ने का दूसरा नाम मेक इन इंडिया है। यहां पर ध्‍यान देने वाली बात यह भी है कि अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। भारत के ट्रेडिंग पार्टनर के तौर पर पहला स्‍थान चीन का आता है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में अमेरिका ने 21.5 बिलियन डॉलर का व्‍यापर किया था जबकि भारत ने 44.8 बिलियन डॉलर का व्‍यापार किया था। भारत की तरफ से अमेरिका को जो सेवाएं दी गई थीं उसमें आईटी सेक्‍टर, टेक्‍सटाइल मशीनरी, डायमंड, केमिकल, आयरन और स्‍टील के सामान, कॉफी, चाय और दूसरे प्रोडेक्‍ट शामिल थे। वहीं भारत ने अमेरका से एयरक्राफ्ट, फर्टीलाइजर, कंप्‍यूटर हार्डवेयर,स्‍क्रेप मैटल और मेडिकल इक्‍यूपमेंट्स आदि खरीदे थे। इतना ही नहीं अमेरिका भारत में सबसे बड़ा निवेशक भी है। करीब 9 बिलियन डॉलर का डायरेक्‍ट इंवेस्‍टमेंट जो पूरे विदेशी निवेश का नौ प्रतिशत है, सिर्फ अमेरिका द्वारा ही किया गया है।

रक्षा क्षेत्र में सहयोग

ओबामा प्रशासन के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा से जुड़े कुछ बड़े समझौते हुए थे। इसके अंतर्गत अमेरिका और भारत के बीच आठ P-8 पोसेडॉन विमान खरीद समझौता भी हुआ था। यह समझौता करीब 2.1 बिलियन डॉलर का था। इसके अलावा बोइंग C-17 मिलिट्री एयरक्राफ्ट को लेकर भी करीब 5 बिलियन डॉलर का समझौता हुआ था। यहां पर ध्‍यान देने वाली बात यह भी है कि अमेरिका रूस और इजरायल के बाद भारत को सैन्‍य उपकरण  बेचने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत की कोशिश इस क्षेत्र में और आगे जाने की जरूर होगी। हाल ही में अमेरिका से हॉवित्‍जर तोपों की सप्‍लाई भी की गई है। मोदी और ट्रंप की इस मुलाकात में दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्‍त युद्ध अभ्‍यास को लेकर भी दोनों देश आगे बढ़ सकते है


चीन को लेकर चिंता

चीन के बढ़ते कदम भारत और अमेरिका के लिए लगातार चिंता का सबब बने हुए हैं। हाल ही में चीन ने अफ्रीका में जिबुता में अपना एक मिलिट्री बेस स्‍थापित किया है। यहां पर अमेरिका का पहले से ही  एक नेवल बेस भी है। इसके अलावा यह क्षेत्र दक्षिण से स्‍वेज नहर में जाने का बड़ा रास्‍ता है। अमेरिका के लिए चिंता की बात यह है कि चीन लगातार भारत और उसको घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। जानकार यह भी मानते हैं कि चीन का यह कदम विश्‍व में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ही उठाया जा रहा है। इसके अलावा भारत की चिंता यह है कि श्री लंका के बाद पाकिस्‍तान और अब जिबूती से चीन भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। वहीं दो दिन पहले चीन के तीन युद्धपोत पाकिस्‍तान पहुंचे है। यहां पर ग्‍वादर पोर्ट की जिम्‍मेदारी पाकिस्‍तान चीन को सौंप चुका है। इसके अलावा भी चीन आर्थिक कॉरिडोर के माध्‍यम से भी भारत को घेरने में जुटा है। लिहाजा इस क्षेत्र में भारत और अमेरिका की चिंता एक समान है। उम्‍मीद है कि इस दिशा में भारत और अमेरिका के बीच न सिर्फ बातचीत होगी बल्कि चीन के बढ़ते कदमों को रोकने की दिशा में आगे भी बढ़ा जाएगा।  

भारतीयों पर नस्‍लीय हिंसा

ट्रंप के सत्‍ता में आने के बाद जिस तरह से अमेरिका में भारतीयों पर नस्‍लीय हमले किए गए हैं उनको देखते हुए पीएम ट्रंप के समक्ष इस मुद्दे को उठा सकते हैं। ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने के बाद कुछ ही महीनों में लगातार भारतीयों पर कई हमले किए गए। इन हमलों में दो भारतीयों की जान भी चली गई थी। भारत ने उस वक्‍त भी इस पर गहरी चिंता जताई थी और अमेरिका से भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की थी। पीएम मोदी की आगामी यूएस यात्रा के दौरान इस मुद्दे के भी उठने की पूरी संभावना है।

उम्‍मीदों के बीच अहम मुलाकात

दैनिक जागरण की स्‍पेशल डेस्‍क से बात करते हुए भारत के पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर ने माना कि पीएम मोदी और डोनाल्‍ड ट्रंप के बीच होने वाली यह मुलाकात काफी अहम होगी। इस दौरान एच 1 बी वीजा पॉलिसी पर भारत अपने विचार रखकर यह समझाने की कोशिश करेगा कि यह दोनों देशों के हितों में नहीं है। उनका यह भी कहना है कि दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों के बीच यह पहली मुलाकात है लिहाजा इससे काफी उम्‍मीदें भी हैं। हैदर मानते हैं कि पेरिस समझौते से अलग होने और इस दौरान भारत के खिलाफ बयानबाजी करने का असर इस वार्ता पर दिखाई नहीं देगा। उनका यह भी कहना है कि भारत को इस विषय पर भी बात जरूर करनी चाहिए। उन्‍होंने माना कि पूर्व में ट्रंप के बयान जरूर गलत थे। हैदर का कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले दशक के दौरान जिस तरह से घनिष्‍ठता बढ़ी है उसका फायदा भी साफतौर पर देखा जा सकता है। पूर्व में भारत और अमेरिका के कुछ रक्षा सौदे भी हुए हैं इसके अलावा भी दोनों देश कई मुद्दों पर आगे बढ़े हैं।

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